आईआईएमसी विद्यार्थियों ने तपोवन महारोगी सेवा मंडल का किया शैक्षणिक दौरा
अमरावती
भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), अमरावती के विद्यार्थियों ने बीते 6 फरवरी को तपोवन स्थित तपोवन महारोगी सेवा मंडल का एक विशेष शैक्षणिक दौरा किया, जो उनके लिए केवल एक क्षेत्र भ्रमण न रहकर जीवन और पत्रकारिता के वास्तविक सरोकारों को समझने का एक गहरा अनुभव बन गया। शहर की भागदौड़ से दूर, लगभग 388 एकड़ में फैला यह परिसर अपनी हरियाली और शांति के साथ मानवीय जिजीविषा की एक अनूठी कहानी कहता है। जैसे ही विद्यार्थी इस विशाल परिसर में दाखिल हुए, उन्हें वहां की कार्यशालाओं से आती श्रम की थाप और लोगों के बीच आपसी सहयोग का एक ऐसा वातावरण मिला जो किसी सामान्य अस्पताल या संस्था में देखने को नहीं मिलता। यह वह स्थान है जहाँ समाज द्वारा उपेक्षित और तिरस्कृत किए गए लोगों को न केवल चिकित्सा सुविधा दी जाती है, बल्कि उन्हें एक गरिमामय और आत्मनिर्भर जीवन जीने का मार्ग भी दिखाया जाता है।
विद्यार्थियों के लिए यह दौरा किताबी ज्ञान से परे समाज की उस कड़वी और संवेदनशील सच्चाई से रूबरू होने का माध्यम बना, जिसे अक्सर मुख्यधारा का मीडिया हाशिए पर छोड़ देता है। तपोवन पहुँचने से पहले विद्यार्थियों के मन में कुष्ठरोग और उससे प्रभावित व्यक्तियों को लेकर समाज में व्याप्त तमाम तरह की भ्रांतियाँ और डर थे, लेकिन वहां के जीवंत वातावरण और वहां रहने वाले लोगों को देखकर उनकी यह धारणाएं पूरी तरह बदल गईं। उन्होंने देखा कि वहां रहने वाले लोग केवल रोगी नहीं हैं, बल्कि वे कुशल कारीगर, किसान और अपने आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करने वाले सजग नागरिक हैं। यह अनुभव उनके लिए पत्रकारिता की एक ऐसी व्यावहारिक कक्षा बन गया, जहाँ उन्होंने सीखा कि एक पत्रकार का असली धर्म उन आवाजों को मंच देना है जो समाज के शोर में अनसुनी रह जाती हैं।
इस सेवा प्रकल्प की नींव गांधीवादी विचारधारा के ठोस धरातल पर टिकी है। तपोवन महारोगी सेवा मंडल की स्थापना 24 सितंबर 1946 को प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी पद्मश्री डॉ. शिवाजीराव पटवर्धन ने की थी। वह दौर ऐसा था जब कुष्ठरोग को केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि एक सामाजिक अभिशाप और दैवीय प्रकोप माना जाता था। पीड़ित व्यक्ति को परिवार से बेदखल कर दिया जाता था और समाज उसे जीते जी मृत घोषित कर देता था। ऐसे अंधकारपूर्ण समय में महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर डॉ. पटवर्धन ने 'जगदंबा कुष्ठधाम' की शुरुआत की, जो आज इस वटवृक्ष के रूप में खड़ा है। गांधी जी का स्पष्ट मानना था कि कुष्ठरोगियों की सेवा ही सच्ची मानव सेवा है और उन्होंने बार-बार यह संदेश दिया था कि यह बीमारी छूने से नहीं फैलती, बल्कि इसके शिकार व्यक्ति हमारे प्रेम और सहानुभूति के हकदार हैं।
तपोवन की सबसे बड़ी विशेषता इसका उपचार से परे पुनर्वास का मॉडल है। यहाँ के प्रबंधन का मानना है कि केवल दवाइयों से शरीर का घाव तो भर सकता है, लेकिन समाज द्वारा दिए गए मानसिक घावों को भरने के लिए व्यक्ति का आत्मनिर्भर होना अनिवार्य है। इसी उद्देश्य के साथ संस्थान में रोगियों को निःशुल्क चिकित्सा और विशेषज्ञों की देखरेख के साथ-साथ विभिन्न व्यावसायिक कौशलों का प्रशिक्षण दिया जाता है। विद्यार्थियों ने वहां देखा कि कैसे लोग चटाई निर्माण, खादी बुनाई, बढ़ईगिरी, चर्मशिल्प और प्रिंटिंग प्रेस जैसे कार्यों में निपुण होकर अपनी आजीविका कमा रहे हैं। यह आर्थिक स्वतंत्रता उन्हें यह अहसास कराती है कि वे समाज पर बोझ नहीं, बल्कि उत्पादक अंग हैं।
इस स्वावलंबन के पीछे भावनात्मक त्रासदियों की एक गहरी परत भी छिपी है। तपोवन में रह रही कई महिलाओं की कहानियाँ दिल को झकझोर देने वाली हैं। यहाँ ऐसी कई बुजुर्ग महिलाएँ हैं जिन्हें दशकों पहले उनके पतियों ने केवल इलाज के बहाने यहाँ छोड़ा था। उस समय वे युवा थीं और इस उम्मीद में यहाँ रुकी थीं कि ठीक होते ही घर लौट जाएँगी। शुरुआत में उनके परिजन हाल-चाल लेने आए, लेकिन धीरे-धीरे वे मुलाकातें बंद हो गईं और अंततः उनका पता भी खो गया। आज ये महिलाएँ चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह स्वस्थ हैं, लेकिन उनके घर के दरवाजे उनके लिए हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। इसके बावजूद, वे आज भी मांग में सिंदूर सजाती हैं और हर आने वाले अजनबी में अपने किसी परिजन की आहट तलाशती हैं। संस्थान के अध्यक्ष डॉ. सुभाष श्यामराव गवई बताते हैं कि यह सामाजिक विडंबना है कि आज भी अपनों द्वारा ठुकराए जाने का दर्द इन लोगों के चेहरे पर साफ पढ़ा जा सकता है।
संस्थान के भ्रमण के दौरान एक कड़वी सामाजिक सच्चाई यह भी उभरकर आई कि समाज का व्यवहार पुरुष और महिला रोगियों के प्रति दोहरा है। आंकड़ों और अनुभवों के आधार पर यह देखा गया है कि जब घर का कोई पुरुष इस बीमारी की चपेट में आता है, तो अक्सर उसकी पत्नी पूरी निष्ठा के साथ उसकी सेवा करती है और ठीक होने पर उसे ससम्मान घर ले जाती है। इसके विपरीत, यदि महिला इस बीमारी का शिकार होती है, तो उसे त्याग दिए जाने की संभावना बहुत अधिक होती है। यह स्थिति हमारे समाज की गहरी पितृसत्तात्मक जड़ों और महिलाओं के प्रति संवेदनहीनता को उजागर करती है। जलगाँव, नंदुरबार और नासिक जैसे जिलों से आई कई महिलाएँ आज भी अपने गाँव लौटने के नाम से सिहर उठती हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि समाज उन्हें फिर से अपनाने से मना कर देगा। इन महिलाओं की जीवन यात्रा केवल बीमारी से लड़ने की कहानी नहीं है, बल्कि सामाजिक अस्वीकृति और अकेलेपन के लंबे संघर्ष की भी दास्तान है। कई महिलाएँ बताती हैं कि जब उन्हें पहली बार बीमारी का पता चला, तो परिवार ने सहारा देने के बजाय उनसे दूरी बना ली। कुछ को इलाज के बहाने संस्थान में छोड़ दिया गया और फिर वर्षों तक कोई उनका हाल पूछने नहीं आया। धीरे-धीरे समय बीतता गया और इंतजार की वह डोर भी कमजोर पड़ती चली गई। जो महिलाएँ कभी अपने घर-परिवार की जिम्मेदारियों में व्यस्त रहती थीं, आज वे संस्थान की चारदीवारी के भीतर ही अपने जीवन का नया अर्थ खोजने की कोशिश कर रही हैं।तपोवन में रहने वाली कई महिलाओं की आँखों में आज भी अपने अतीत की यादें तैरती दिखाई देती हैं। वे अपने बच्चों, पति और परिवार के उन दिनों को याद करती हैं जब उनका जीवन सामान्य था। बीमारी ने न केवल उनके शरीर को प्रभावित किया, बल्कि उनके सामाजिक रिश्तों को भी तोड़ दिया। इसके बावजूद, इन महिलाओं के भीतर जीने की अद्भुत शक्ति दिखाई देती है। उन्होंने परिस्थितियों से समझौता करते हुए अपने जीवन को नए सिरे से सँवारने का प्रयास किया है।संस्थान का वातावरण इन महिलाओं को एक नया सहारा देता है। यहाँ वे एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करती हैं, बातचीत करती हैं और अपने अनुभव साझा करती हैं। कई महिलाएँ चटाई बनाना, सिलाई, खादी बुनाई या अन्य छोटे-मोटे काम सीखकर आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रही हैं। यह काम केवल उनकी आजीविका का साधन नहीं है, बल्कि उनके आत्मसम्मान को भी पुनर्जीवित करता है। जब वे अपने श्रम से कुछ अर्जित करती हैं, तो उन्हें यह महसूस होता है कि वे अब भी समाज का एक उपयोगी हिस्सा हैं।
इसके साथ ही संस्थान के कर्मचारी और स्वयंसेवक भी इन महिलाओं को भावनात्मक सहारा देने का प्रयास करते हैं। वे उन्हें यह भरोसा दिलाते हैं कि बीमारी किसी व्यक्ति की पहचान नहीं होती और हर व्यक्ति सम्मान के साथ जीने का हकदार है। समय-समय पर आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम, सामूहिक प्रार्थनाएँ और अन्य गतिविधियाँ उनके जीवन में सकारात्मकता लाने का माध्यम बनती हैं।फिर भी, उनके मन के किसी कोने में अपने परिवार से मिलने की चाह आज भी जीवित है। कुछ महिलाएँ इस उम्मीद में वर्षों से प्रतीक्षा कर रही हैं कि शायद एक दिन उनका कोई अपना उन्हें वापस घर ले जाने आएगा। लेकिन वास्तविकता अक्सर उनकी उम्मीदों से अलग होती है। समाज में व्याप्त भय और अज्ञानता के कारण लोग आज भी कुष्ठरोग को लेकर कई तरह की गलत धारणाएँ पालकर बैठे हैं। यही कारण है कि बीमारी से पूरी तरह ठीक हो जाने के बाद भी इन लोगों को सामाजिक स्वीकृति मिलना आसान नहीं होता।यह स्थिति केवल चिकित्सा या उपचार का विषय नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदनशीलता से जुड़ा हुआ प्रश्न है। जब तक समाज अपने दृष्टिकोण में बदलाव नहीं लाएगा और इन लोगों को समान अधिकारों के साथ स्वीकार नहीं करेगा, तब तक ऐसी कहानियाँ सामने आती रहेंगी। तपोवन की इन महिलाओं का जीवन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि असली बीमारी शरीर में नहीं, बल्कि समाज की सोच में छिपी हुई है।
तपोवन केवल एक चिकित्सा केंद्र नहीं, बल्कि एक संपूर्ण आध्यात्मिक और सामुदायिक इकाई है। परिसर में स्थित जापानी शैली का शिव मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल यहाँ के निवासियों को मानसिक शांति प्रदान करते हैं। नियमित भजन और सामूहिक प्रार्थनाओं के माध्यम से उनके भीतर के अकेलेपन को दूर करने का प्रयास किया जाता है। इतना ही नहीं, यह संस्था अब कुष्ठरोगियों से आगे बढ़कर मेलघाट जैसे आदिवासी क्षेत्रों के अनाथ और जरूरतमंद बच्चों के लिए भी शिक्षा और आश्रय का केंद्र बन गई है। जब किसी निवासी की मृत्यु होती है और उनके परिजन शव लेने से इनकार कर देते हैं, तो संस्था के कर्मचारी ही उनके सगे संबंधी बनकर उनका अंतिम संस्कार करते हैं। वास्तव में तपोवन ही अब इन लोगों का एकमात्र परिवार और संसार है।
राष्ट्रीय स्तर पर यदि कुष्ठरोग की स्थिति को देखें, तो भारत ने 2005 में इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या की श्रेणी से बाहर करने का लक्ष्य प्राप्त कर लिया था। सरकारी प्रयासों के फलस्वरूप नए मामलों में काफी कमी आई है। वर्ष 2014-15 में जहाँ सवा लाख से अधिक नए मामले थे, वहीं अब यह संख्या घटकर काफी कम रह गई है। सरकार ने 2027 तक शून्य संक्रमण का लक्ष्य रखा है और राष्ट्रीय रणनीतिक योजना के तहत मुफ्त इलाज और विकलांगता रोकथाम पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन तपोवन का अनुभव यह बताता है कि असली लड़ाई चिकित्सा विज्ञान की नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता की है। जब तक समाज इन लोगों को बराबरी का दर्जा नहीं देगा, तब तक सरकारी आंकड़े केवल कागजों तक ही सीमित रहेंगे।
आईआईएमसी के हिन्दी,अंग्रजी व मराठी पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए यह यात्रा एक आत्मचिंतन का विषय रही। उन्होंने महसूस किया कि वास्तविक विकास का पैमाना केवल ऊँची इमारतें या जीडीपी के आंकड़े नहीं हो सकते। विकास का सही अर्थ तब सिद्ध होता है जब समाज का सबसे अंतिम और उपेक्षित व्यक्ति भी गरिमा के साथ जी सके। पत्रकारिता के छात्रों के रूप में उन्होंने यह संकल्प लिया कि वे भविष्य में अपनी लेखनी के माध्यम से ऐसे संवेदनशील मुद्दों को निरंतर उठाते रहेंगे। तपोवन हमें यह सिखाता है कि मानवता का धर्म किसी भी बीमारी या सामाजिक डर से कहीं ऊपर है। यह स्थान एक आशा का दीप है, जो हमें याद दिलाता है कि यदि प्रेम और अवसर दिया जाए, तो तिरस्कृत जीवन भी मुख्यधारा में लौटकर समाज को नई दिशा दे सकता है। विद्यार्थियों की यह यात्रा एक ऐसी सीख के साथ समाप्त हुई, जिसने उन्हें न केवल बेहतर पत्रकार, बल्कि एक संवेदनशील इंसान बनने की प्रेरणा दी।
इस अवसर पर भारतीय जनसंचार संस्थान अमरावती के क्षेत्रीय निदेशक डाँ. राजेश सिंह कुशवाहा,सहायक प्रध्यापक डाँ. विनोद निताले,डाँ. आदित्या मिश्रा,डाँ. प्रमोद गायकवाड़,जयंत सोनोने,रोहन तायड़े मौजूद रहे।
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